रत और उसके मूल्यों के साथ जुड़ी जो भावनाएं हैं, वो किसी सीमित दायरे में सीमित नहीं हैं। भारत की आत्मा में एकता, विविधता और सहिष्णुता का भाव हमेशा से रहा है। जब हम “खालिस्तान” की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि सिख पंथ की उत्पत्ति भारत की रक्षा और हिंदू समाज की सुरक्षा के लिए हुई थी। गुरु नानक देव जी, जिन्होंने सिख धर्म की स्थापना की, उन्होंने अपने जीवन और उपदेशों में भारत और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को ही बढ़ावा दिया। उनका संदेश मानवता, एकता, और सर्व-धर्म समभाव का था, न कि विभाजन और अलगाव का।
खालिस्तान का विचार: ऐतिहासिक संदर्भ और वास्तविकता
गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना इसलिए की ताकि मुगलों के अत्याचारों से हिंदुओं और भारत भूमि की रक्षा हो सके। सिख गुरु न केवल धर्म के लिए, बल्कि मातृभूमि के लिए भी शहीद हुए हैं। सिख धर्म के वीर योद्धाओं ने हमेशा “भारत भूमि” के साथ अपनी निष्ठा प्रकट की है और अपनी ज़िंदगी इस भूमि की सेवा में अर्पित की है।
अगर खालिस्तान बन भी जाए, तो क्या सारे सिख दुनिया भर से उस छोटे से “खालिस्तान” में आकर बसेंगे? यह असंभव और अव्यवहारिक है। आज सिख समुदाय का हर कोना – चाहे वह दिल्ली हो, मुंबई हो, कनाडा हो, या अमेरिका – में फैला हुआ है। क्या वे सब अपना घर-बार, रोज़गार छोड़कर उस तथाकथित खालिस्तान में जाएंगे? इसका जवाब लगभग सभी के लिए “नहीं” है। खालिस्तान के समर्थकों को यह समझना होगा कि अलगाव का यह विचार न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि असंगत भी है।
राष्ट्रीयता और एकता: एक मज़बूत भारत का निर्माण
भारत के अन्य समुदाय, विशेषकर हिंदू समाज, इस “खालिस्तान” की मांग से बेहद असहज महसूस कर रहे हैं। इसका असर यह हो रहा है कि कई हिंदुओं के मन में सिख समुदाय के प्रति गलत धारणाएँ बनने लगी हैं, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है। इस प्रकार के विभाजनकारी विचार न केवल समाज को बाँटते हैं, बल्कि एकता की भावना को भी चोट पहुँचाते हैं। सिख धर्म और हिंदू धर्म की जड़ें एक ही संस्कृति, एक ही सभ्यता में हैं। सिख समुदाय के “अच्छे सिख” (जो सच्चे देशभक्त हैं और भारत की अखंडता में विश्वास रखते हैं) को इस तरह की विचारधारा का पुरज़ोर विरोध करना चाहिए।
एक भारत, श्रेष्ठ भारत
“एक भारत, श्रेष्ठ भारत” का नारा तभी साकार हो सकता है जब हम सभी मिलकर इस राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए कार्य करें। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चाहे गुरु गोबिंद सिंह जी हों, चाहे गुरु तेग बहादुर जी हों – उन्होंने केवल अपने धर्म की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारत की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। आज जरूरत इस बात की है कि सिख समुदाय के लोग भी इस प्रकार की विभाजनकारी विचारधाराओं से खुद को दूर रखें और स्पष्ट रूप से राष्ट्र की एकता के लिए खड़े हों।
निष्कर्ष
खालिस्तान का विचार न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता को तोड़ने की कोशिश भी है। आज भारत को एकजुटता की जरूरत है, न कि किसी विभाजनकारी विचारधारा की। इसलिए, सिख समुदाय के सभी लोग जो भारत की अखंडता और राष्ट्रीयता में विश्वास रखते हैं, उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए और इस प्रकार के विचारों का विरोध करना चाहिए।
सिखों का भारत के प्रति प्रेम और योगदान अविस्मरणीय है, और यह योगदान तब तक और भी महत्वपूर्ण रहेगा, जब तक हम सभी एक साथ, एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ेंगे। आइए, हम सब मिलकर “एक भारत, मज़बूत भारत” की परिकल्पना को साकार करें।










