✍️ विश्लेषणात्मक हिन्दी लेख
🚩 प्रस्तावना
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है — ऐसा संविधान कहता है, न्यायपालिका बार-बार दोहराती है, और संसद इसे नीति-निर्देशक तत्वों में समाहित करती है। परंतु क्या यह धर्मनिरपेक्षता सभी धर्मों के लिए एक समान है? क्या “समानता का सिद्धांत” हिन्दुओं और सनातन धर्म के अनुयायियों पर भी उसी शक्ति से लागू होता है, जैसे अन्य समुदायों पर? यह प्रश्न अब केवल वैचारिक नहीं, व्यावहारिक भी हो गया है।
भाजपा सांसद डॉ. निशिकांत दुबे के हालिया बयान ने इस बहस को पुनः जन्म दिया कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अतीत में कई बार हिन्दू समुदाय के साथ पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण व्यवहार किया है। प्रस्तुत है 9 ऐसे प्रकरणों का विश्लेषण, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने या तो हिन्दुओं की पीड़ा को अनदेखा किया, या फिर उनके मौलिक अधिकारों को सीमित किया।

1️⃣ कश्मीरी हिन्दू नरसंहार पर चुप्पी
1990 में कश्मीरी हिन्दुओं का योजनाबद्ध नरसंहार हुआ — बलात्कार, हत्या, पलायन और मंदिरों का विध्वंस। परंतु जब इन मामलों को पुनः खोलने की याचिका लगी, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “बहुत समय बीत चुका है।”
❌ इसी न्यायालय ने 1984 के सिख दंगों के मामलों के लिए SIT गठित की थी।
➡️ यह दोहरा मापदंड हिन्दुओं के प्रति न्याय न मिलने की गवाही देता है।
2️⃣ वक्फ अधिनियम पर मौन स्वीकृति
वक्फ एक्ट के माध्यम से मुस्लिम वक्फ बोर्ड को ऐसी शक्तियाँ दी गईं, जिनसे वे कोई भी भूमि “धार्मिक” बता कर अधिग्रहित कर सकते हैं।
🕌 20 लाख एकड़ भूमि पर कब्जा – केवल वक्फ बोर्ड के दम पर।
🔇 सुप्रीम कोर्ट ने 30 वर्षों तक इसकी असंवैधानिकता को नहीं पहचाना।
❓ क्या कोई “सनातन बोर्ड” अगर इसी प्रकार जामा मस्जिद पर दावा करे, तो सहन किया जाएगा?
3️⃣ हिन्दू मंदिरों पर राज्य का नियंत्रण
भारत में लगभग 1.10 लाख मंदिर सरकार के अधीन हैं। इन मंदिरों की संपत्ति, आय, और निर्णय-निर्माण पर राज्य सरकारों का सीधा अधिकार है।
🕌 लेकिन कोई मस्जिद या चर्च सरकार के अधीन क्यों नहीं?
📜 सुप्रीम कोर्ट में “मंदिर मुक्ती आंदोलन” की याचिका 2012 से लंबित है।
➡️ धर्मनिरपेक्षता केवल हिन्दुओं पर ही क्यों लागू?
4️⃣ RTE कानून – सिर्फ हिन्दुओं पर बाध्य
‘शिक्षा का अधिकार’ कानून के अंतर्गत केवल हिन्दू स्कूलों पर 25% EWS आरक्षण लागू होता है।
✝️ ईसाई या मुस्लिम स्कूल इससे मुक्त हैं।
📉 परिणाम: हजारों हिन्दू स्कूल बंद हो गए, लाखों बच्चे अन्य धर्मों के स्कूलों में जा रहे हैं – जहाँ धर्मांतरण की आशंका प्रबल है।
5️⃣ मुक्त अभिव्यक्ति – पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण
तमिलनाडु में एक मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने “सनातन धर्म को खत्म करने” की बात कही, पर सुप्रीम कोर्ट मौन रहा।
❌ नूपुर शर्मा ने सिर्फ कुरान से श्लोक पढ़ा, तो अदालत ने कठोर टिपण्णी कर दी।
➡️ यह स्पष्ट करता है कि हिन्दू धर्म के अपमान को “hate speech” नहीं माना जाता, परंतु अन्य धर्मों की आलोचना अपराध बन जाती है।
6️⃣ सनातनी परंपराओं पर रोक
🔸 कोल्हापुर दशहरा में पशु बलि पर प्रतिबंध
🔸 जनमाष्टमी में पिरामिड की ऊँचाई तय कर दी गई
🔸 दिवाली पर पटाखों पर बैन, पर क्रिसमस और न्यू ईयर पर आतिशबाज़ी मान्य
🕋 हलाल बलि की क्रूर पद्धति पर कोई चर्चा नहीं
➡️ हिन्दू परंपराओं पर सीधा हस्तक्षेप, पर अन्य धर्मों के क्रियाकलापों पर मौन।
7️⃣ स्थलों का पूजा अधिनियम (Places of Worship Act, 1991)
इस कानून के अनुसार 15 अगस्त 1947 के बाद से सभी धार्मिक स्थल अपनी स्थिति में रहेंगे।
🛕 इसका मतलब – काशी, मथुरा जैसे हज़ारों स्थानों की ऐतिहासिक सत्यता पर पर्दा डालना।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम को “सद्भावना की मिसाल” बताया।
❓ पर क्या अन्याय को ‘क़ानून’ के आवरण में छिपाना ही न्याय है?
8️⃣ शबरीमला निर्णय – परंपरा बनाम प्रगतिशीलता
शबरीमला मंदिर में प्रवेश प्रतिबंध पर कोर्ट ने “लैंगिक समानता” का हवाला देकर हस्तक्षेप किया।
🚺 परंतु क्या अन्य धर्मों की प्रथाओं पर भी यही साहस दिखाया गया?
✝️ कैथोलिक चर्च में महिला पुजारी नहीं बन सकतीं।
🕌 मस्जिद में महिलाएँ प्रवेश नहीं कर सकतीं, नमाज़ नहीं पढ़ सकतीं।
➡️ यह “selective secularism” नहीं तो और क्या है?
9️⃣ CAA विरोध और शाहीन बाग़ का समर्थन
2020 में शाहीन बाग आंदोलन ने देश की राजधानी को जाम कर दिया। सार्वजनिक मार्ग महीनों बंद रहे।
🧕🏽 भीड़ “शहादत” के नारों के साथ हिंसा की ओर बढ़ी।
⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कानून लागू करने के बजाय “मध्यस्थता” की सलाह दी!
➡️ क्या अब भ्रष्टाचार, दंगे, अपराध – सबका समाधान “मध्यस्थता” से होगा?
🔚 निष्कर्ष – क्या न्याय वास्तव में अंधा है?
न्यायालयों से अपेक्षा होती है कि वे न तो ताली से डरें, न गाली से।
न्याय तर्क, सिद्धांत, और समानता पर आधारित होता है – भावनाओं, धर्म, या राजनीति पर नहीं।
परंतु जब न्याय का तराजू झुकता है, तो समाज में संतुलन टूटता है।
👉 जब हिन्दुओं की आवाज़ अनसुनी की जाती है, तो “अधिकार” नहीं बल्कि “अपमान” का अनुभव होता है।
👉 और यही “धार्मिक युद्धों के बीज” बो देता है — जैसा कि निशिकांत दुबे जी ने कहा।
🧭 अब क्या करना चाहिए?
संसद को Places of Worship Act और Waqf Act की समीक्षा करनी चाहिए।
हिन्दू धार्मिक संस्थानों को सरकार के नियंत्रण से मुक्त किया जाए।
न्यायपालिका को समान दृष्टि से सभी समुदायों पर कानून लागू करना होगा।
हिन्दुओं को संगठित होकर तथ्यों के साथ अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए।
🙏 जय सनातन! वन्दे मातरम्!
✍️ यह लेख प्रस्तुत किया गया है:
गुरुजी सुनील चौधरी
Founder – Career Building School (पूर्व में TAMS Studies) & JustBaazaar
📧 Email: sunil@justbaazaar.com
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भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों ने हिंदू समुदाय और सनातन संस्कृति के प्रति पक्षपातपूर्ण रुख को उजागर किया है। ये निर्णय न केवल धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के खिलाफ हैं, बल्कि संविधान में निहित समानता और निष्पक्षता के मूल्यों को भी चुनौती देते हैं।
1. हिंदू मंदिरों पर राज्य का नियंत्रण
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी जैसे राज्यों में हिंदू मंदिरों का प्रबंधन राज्य सरकारों के अधीन है। हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने इन राज्यों में हिंदू धार्मिक संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने से परहेज कर रही है।
2. शबरीमला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश
2018 में, सर्वोच्च न्यायालय ने केरल के शबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित किया। यह निर्णय मंदिर की परंपराओं और श्रद्धालुओं की आस्थाओं के खिलाफ था, जिससे व्यापक विरोध और असंतोष उत्पन्न हुआ। Wikipedia
3. शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) और हिंदू स्कूल
RTE अधिनियम के तहत, गैर-अल्पसंख्यक निजी स्कूलों को 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित करनी होती हैं, जबकि अल्पसंख्यक स्कूलों को इससे छूट प्राप्त है। इससे हिंदू संचालित स्कूलों पर वित्तीय दबाव बढ़ा है और कई स्कूल बंद होने की कगार पर हैं। Business News Today
4. वक्फ अधिनियम और संपत्ति विवाद
वक्फ अधिनियम के तहत, मुस्लिम समुदाय को किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित करने का अधिकार है, जिससे हिंदू संपत्तियों पर दावा किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम की समीक्षा करने से परहेज किया है, जिससे हिंदू समुदाय में असंतोष बढ़ा है।
5. धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मांतरण
सर्वोच्च न्यायालय ने 1977 में स्टेनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश मामले में निर्णय दिया कि धर्म प्रचार का अधिकार धर्मांतरण के अधिकार में नहीं आता।हालांकि, यह निर्णय जबरन या धोखे से धर्मांतरण को रोकने के लिए था, लेकिन इसका दुरुपयोग हिंदू संगठनों द्वारा धर्म प्रचार को रोकने के लिए किया गया है।
6. हिंदू विवाह अधिनियम और समान-लैंगिक विवाह
सुप्रियो बनाम भारत संघ मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने समान-लैंगिक विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मान्यता देने से इनकार कर दिया।यह निर्णय उन हिंदू समलैंगिक जोड़ों के लिए निराशाजनक था जो अपने विवाह को वैधता दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
7. धार्मिक स्थलों के नाम बदलने की याचिका
सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में एक याचिका को खारिज कर दिया जिसमें ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों के नामों को उनके मूल नामों में बदलने की मांग की गई थी। न्यायालय ने कहा कि “हिंदू धर्म एक जीवन शैली है, न कि केवल एक धर्म,” और अतीत को खोदने से केवल असहमति और असंतोष उत्पन्न होगा। TBS News
निष्कर्ष
उपरोक्त मामलों से स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णयों ने हिंदू समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता और परंपराओं को प्रभावित किया है। यह आवश्यक है कि न्यायपालिका सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण अपनाए और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का पालन करे।










