शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद का गहन विश्लेषण

— एक सनातन चेतना से उपजा चिंतन

लेखक: Tandavacharya Sunil Chaudhari

भारत भूमि केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं है, यह ऋषियों की तपस्या, वेदों की वाणी, उपनिषदों की अनुभूति और सनातन परंपरा की जीवंत धड़कन है। यहां गुरु परंपरा केवल पद नहीं, बल्कि तप, त्याग और तत्वज्ञान की यात्रा रही है। जब इसी परंपरा से जुड़े पद — शंकराचार्य — को लेकर विवाद उठता है, तो प्रश्न केवल व्यक्ति का नहीं रह जाता, प्रश्न पूरी सनातन चेतना का हो जाता है।

आज जिस विषय पर देशभर में चर्चा है, वह है — शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर उत्पन्न हुआ विवाद, प्रयागराज की घटना, प्रशासन से टकराव और उनके शंकराचार्य होने की वैधता पर उठते सवाल। इस पूरे प्रकरण को भावनाओं से नहीं, विवेक से, शास्त्र से और सनातन दृष्टि से समझना आवश्यक है।


विवाद की शुरुआत: मौनी अमावस्या और संगम तट की घटना

18 जनवरी, मौनी अमावस्या — जो कि सनातन परंपरा में अत्यंत पवित्र दिन माना जाता है। प्रयागराज के संगम तट पर करोड़ों श्रद्धालु स्नान के लिए एकत्र होते हैं। इसी दिन 56 वर्षीय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिष्यों के साथ पालकी में सवार होकर संगम की ओर बढ़े। प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के कारण पालकी आगे ले जाने से मना किया और पैदल जाने का आग्रह किया।

यहीं से विवाद ने जन्म लिया।

स्वामी जी का कहना था कि पालकी पर बैठने का उद्देश्य अहंकार नहीं, बल्कि दर्शन व्यवस्था है — ताकि दूर बैठे श्रद्धालु भी उन्हें देख सकें और भगदड़ की स्थिति न बने। यह तर्क सुनने में व्यावहारिक प्रतीत होता है, किंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या सनातन परंपरा में यह अनिवार्य है? क्या शंकराचार्य पद की गरिमा पालकी पर बैठने से आती है या चरित्र, तप और ज्ञान से?


आदि शंकराचार्य का आदर्श: पैदल यात्रा और त्याग

जब हम शंकराचार्य परंपरा की बात करते हैं, तो सबसे पहले स्मरण होता है — आदि शंकराचार्य का। आठवीं शताब्दी में जन्मे इस महापुरुष ने मात्र 32 वर्ष की आयु में पूरे भारतवर्ष में पैदल भ्रमण किया। केदारनाथ से कन्याकुमारी, द्वारका से पुरी तक — न पालकी, न छत्र, न वैभव — केवल दंड, कमंडल और ब्रह्मज्ञान।

आदि शंकराचार्य का जीवन हमें यह सिखाता है कि गुरु की महानता उसके साधनों में नहीं, उसके साधन में है।

यदि मौनी अमावस्या के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सामान्य संतों की भांति पैदल संगम तक जाते, तो शायद यह पूरा विवाद उत्पन्न ही न होता।


बड़ा प्रश्न: क्या वे शंकराचार्य हैं?

यहीं से विवाद का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू शुरू होता है —
क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वास्तव में ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य हैं?

प्रयागराज मेला प्राधिकरण द्वारा उन्हें नोटिस जारी किया गया, जिसमें उनसे पूछा गया कि वे अपने नाम के आगे “शंकराचार्य” शब्द का प्रयोग किस आधार पर कर रहे हैं, जबकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।

उनका पक्ष यह है कि उनके गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने उन्हें उत्तराधिकारी घोषित किया था। किंतु सनातन परंपरा केवल गुरु की वसीयत से नहीं चलती, वह संस्था, शास्त्र और स्वीकृति से चलती है।


शंकराचार्य बनने की परंपरा: शास्त्रीय व्यवस्था

सनातन धर्म में शंकराचार्य बनना कोई राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक अत्यंत कठिन साधना-पथ का परिणाम है। परंपरा के अनुसार तीन अनिवार्य शर्तें होती हैं:

  1. व्यक्ति दंडी सन्यासी हो — ब्रह्मचर्य, त्याग और तप का जीवन।
  2. वह वेद, उपनिषद, वेदांत, पुराण, शास्त्रों का महान विद्वान हो।
  3. चारों पीठों की स्वीकृति और काशी विद्वत परिषद की मान्यता आवश्यक हो।

इसके अतिरिक्त, शास्त्रार्थ की परंपरा रही है — जहां विद्वत्ता की सार्वजनिक परीक्षा होती थी। प्रश्न यह है कि क्या इन सभी परंपराओं का पालन इस मामले में हुआ?

कई प्रतिष्ठित संतों और पीठाधीशों का स्पष्ट मत है — नहीं।


वसीयत से शंकराचार्य? परंपरा बनाम सुविधा

ज्योतिर्मठ पीठ में पिछले 70 वर्षों से शंकराचार्य चयन में वसीयत का चलन शुरू हुआ, जो कि मूल परंपरा से भिन्न है। इसी कारण विवाद खड़ा हुआ।

1953 के बाद से यह परंपरा विवादों में घिरी रही, अदालतों में गई, और यहां तक कि एक ही पीठ पर दो-दो शंकराचार्य घोषित हो गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2017 में दोनों को मान्यता देने से इंकार कर दिया। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े आयोजनों और प्रतीकों पर रोक लगा दी।

यह स्पष्ट करता है कि मामला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि विधिक रूप से भी विवादित है।


संत का आचरण: पद से बड़ा होता है चरित्र

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है —
एक संत का व्यवहार कैसा होना चाहिए?

सनातन दृष्टि में संत वह नहीं जो ऊँचे आसन पर बैठे, बल्कि वह है जो सबसे नीचे बैठने को तैयार हो। संत वह है जो माफ कर दे, जो मौन को शक्ति बनाए, जो विवाद से दूर रहे।

संत पद का भूखा नहीं होता।
संत पालकी का मोहताज नहीं होता।
संत छत्रछाया नहीं, चरित्र से पहचाना जाता है।

जब कोई संत प्रशासन से उलझता है, धरना देता है, मीडिया ट्रायल करता है, तो जनता के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है।


सनातन की छवि और हमारी जिम्मेदारी

इस पूरे विवाद का सबसे दुखद पक्ष यह है कि इससे सनातन धर्म की गरिमा को आघात पहुँचता है। आज जब विश्व भारत की ओर योग, वेद, अध्यात्म के लिए देख रहा है, तब हमारे आंतरिक विवाद हमारी शक्ति को कमज़ोर करते हैं।

यह समय है आत्ममंथन का।
यह समय है परंपरा की रक्षा का।
यह समय है सच्चे संतों को पहचानने का।


निष्कर्ष: पद नहीं, परंपरा सर्वोपरि

यह लेख किसी व्यक्ति के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि सनातन परंपरा के पक्ष में है। शंकराचार्य पद कोई राजनीतिक कुर्सी नहीं, यह आत्मिक उत्तरदायित्व है। जब तक चयन की प्रक्रिया पारदर्शी, शास्त्रसम्मत और सर्वमान्य नहीं होगी, तब तक ऐसे विवाद उठते रहेंगे।

हमें चाहिए कि हम व्यक्ति पूजा से ऊपर उठकर सिद्धांत पूजा करें। गुरु को देखें, लेकिन गुरु तत्व को उससे भी ऊपर रखें।


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जय सनातन | वंदे मातरम्

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