बॉलीवुड सिर्फ एक फिल्म इंडस्ट्री नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धारा को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा माध्यम है। फिल्मों और गानों के माध्यम से समाज में जो कुछ भी दिखाया जाता है, वह जनता की मानसिकता और व्यवहार पर गहरा असर डालता है।

आज के समय में बॉलीवुड में महिलाओं को किस तरह से दिखाया जाता है? क्या यह सिर्फ मनोरंजन है या फिर यह समाज में सेक्सिज्म और महिलाओं के वस्तुकरण (Objectification) को बढ़ावा देने का एक साधन बन चुका है?
इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि –
✅ बॉलीवुड में महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है?
✅ आइटम सॉन्ग्स और फिल्मों में सेक्सिज्म कैसे दिखाया जाता है?
✅ क्या फिल्मों में दिखाए जाने वाले दृश्यों का समाज पर प्रभाव पड़ता है?
✅ और इस मानसिकता को बदलने के लिए क्या किया जा सकता है?
बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग्स: क्या यह सिर्फ मनोरंजन है?
अगर हम हाल के दशकों के बॉलीवुड गानों को देखें, तो पाएंगे कि इनमें या तो महिलाओं को वस्तु के रूप में दिखाया जाता है या फिर गानों के बोल सीधे-सीधे सेक्सुअल एक्टिविटी की ओर इशारा करते हैं।
🔴 डबल मीनिंग गाने: सेक्सुअल हिंट से भरे गीत
कुछ उदाहरण देखिए –
🎵 “मैं तो तंदूरी मुर्गी हूँ, गटका ले मुझे अल्कोहल से” – इसमें लड़की को खाने की चीज़ के रूप में दिखाया गया है।
🎵 “छोटे-छोटे कपड़े डाल, तेरा फिगर दिखता है” – यह गाना महिलाओं के पहनावे पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करता है।
🎵 “झंडू बाम बनी, तुझपे लुट जाऊं” – एक महिला को दर्द निवारक बाम से तुलना करना।
🎵 “तेरे लिए सुपारी बना के, मुझको जो वो बेदर्द आरी रे” – यहां एक महिला को सुपारी की तरह पेश किया गया है।
👉 सवाल यह है कि यह केवल गाने हैं या समाज में महिलाओं की छवि को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का एक तरीका?
बॉलीवुड में सेक्सिज्म और महिलाओं का वस्तुकरण
🔴 1. महिलाओं की भूमिका सिर्फ “ग्लैमर” तक सीमित क्यों?
🔹 बॉलीवुड की अधिकतर फिल्मों में हीरोइन का काम सिर्फ एक रोमांटिक एंगल जोड़ने तक सीमित होता है।
🔹 महिला किरदारों का विकास पुरुष किरदारों के मुकाबले कहीं कम होता है।
🔹 कई फिल्मों में हीरोइन का मुख्य कार्य केवल हीरो को आकर्षित करना, गाने में डांस करना और अंत में उसकी प्रेमिका या पत्नी बन जाना होता है।
उदाहरण:
🎬 हॉलिडे – सोनाक्षी सिन्हा का कोई विशेष रोल नहीं था, सिर्फ हीरो की प्रेमिका का किरदार।
🎬 रेड – इलियाना डिक्रूज सिर्फ एक पत्नी के रूप में नजर आईं, पूरी फिल्म में उनका रोल सीमित था।
🔴 2. एज गैप और महिला कलाकारों की सीमित उम्र
बॉलीवुड में हमेशा देखा जाता है कि –
✅ 40-50 साल के अभिनेता 20-25 साल की अभिनेत्रियों के साथ रोमांस करते नजर आते हैं।
✅ वहीं, 30-35 साल के बाद महिला कलाकारों के लिए रोल मिलने लगभग बंद हो जाते हैं।
✅ 50+ उम्र की अभिनेत्रियों को उनके हमउम्र अभिनेताओं की मां की भूमिका दे दी जाती है।
उदाहरण:
🎬 भारत (2019) – सलमान खान (53 साल) और दिशा पटानी (25 साल) के बीच 28 साल का एज गैप था।
🎬 पुलिसगिरी (2013) – संजय दत्त (55 साल) और प्राची देसाई (25 साल) के बीच 30 साल का एज गैप।
🎭 लेकिन क्या आप कभी सोच सकते हैं कि तब्बू और कार्तिक आर्यन को रोमांटिक जोड़ी के रूप में दिखाया जाए?
बॉलीवुड और रेप कल्चर
🔴 3. बॉलीवुड ने रेप को ‘मनोरंजन’ बना दिया?
बॉलीवुड ने रेप सीन को इतना सामान्य बना दिया कि कई फिल्मों में यह सिर्फ एक “आइटम” बनकर रह गया।
उदाहरण:
🎬 जानी दुश्मन (2002) – फिल्म में मनीषा कोइराला का किरदार जब रेप अटेम्प्ट से गुजरता है, तो हीरो अक्षय कुमार कहता है –
🗣️ “इतनी खूबसूरत लड़की को देखकर मरे हुए आदमी का भी दिल धड़क उठे, फिर ये जीते-जागते नौजवान हैं, इनका क्या हाल होगा?”
🎬 पुरानी फिल्मों में – रेप सीन को एक इरोटिक सीन की तरह फिल्माया जाता था, ताकि सेंसर बोर्ड इसे हटा न सके।
👉 समस्या यह है कि जब बार-बार एक ही चीज़ लोगों को दिखाई जाती है, तो यह सामान्य लगने लगती है। यही वजह है कि समाज में यौन हिंसा की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।
समाधान: बॉलीवुड और समाज में बदलाव कैसे लाएं?
✔️ 1. फिल्मों में महिलाओं के लिए बेहतर भूमिकाएं लिखी जाएं
🔹 महिला प्रधान फिल्मों को भी उतना ही महत्व दिया जाए, जितना मेल-लीड फिल्मों को दिया जाता है।
🔹 “कंगना रनौत की “पंगा”, तापसी पन्नू की “थप्पड़” जैसी फिल्मों को ज्यादा बढ़ावा मिलना चाहिए।
✔️ 2. आइटम सॉन्ग्स और महिलाओं की गलत प्रस्तुति को बंद किया जाए
🔹 बॉलीवुड को यह समझना होगा कि महिलाओं को वस्तु की तरह दिखाना गलत है।
🔹 अनावश्यक आइटम सॉन्ग्स और सेक्सिस्ट डायलॉग्स को सेंसर किया जाना चाहिए।
✔️ 3. सेक्स एजुकेशन को बढ़ावा दिया जाए
🔹 बच्चों को सेक्स एजुकेशन देना बेहद जरूरी है ताकि वे सही-गलत में फर्क कर सकें।
🔹 जब बच्चों को घर और स्कूल में सही जानकारी दी जाएगी, तो वे इसे फिल्मों से नहीं सीखेंगे।
✔️ 4. महिलाओं की समान वेतन (Equal Pay) की व्यवस्था हो
🔹 दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा जैसी बड़ी अभिनेत्रियां भी पुरुष अभिनेताओं से 5 गुना कम कमाती हैं।
🔹 यह असमानता बंद होनी चाहिए।
निष्कर्ष
बॉलीवुड सिर्फ एक फिल्म इंडस्ट्री नहीं, बल्कि यह समाज को दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
यदि फिल्मों में महिलाओं को सम्मान के साथ पेश किया जाए, तो समाज में भी उनके प्रति नजरिया बदलेगा।
लेकिन बदलाव सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री से नहीं, बल्कि हम सभी की सोच में भी बदलाव लाने की जरूरत है।
👉 अगर आप इस बदलाव में योगदान देना चाहते हैं, तो –
✅ महिला प्रधान फिल्मों को सपोर्ट करें।
✅ बॉलीवुड में सेक्सिज्म को पहचानें और इसके खिलाफ आवाज उठाएं।
✅ इस ब्लॉग को शेयर करें, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस समस्या को समझ सकें।
क्या आपको लगता है कि बॉलीवुड में महिलाओं की छवि को सुधारने की जरूरत है? अपनी राय कमेंट सेक्शन में बताएं! 🎬💡











