🪔 Introduction – The Rise of Alternative Bharat-Centric Media
🚩 “आजकल आपका जो मीडिया है, वह बहुत कष्ट में है…” — यही वाक्य खोलता है वह भयंकर सच्चाई जो Harsh Kumar जी ने जयपुर डायलॉग्स के Podcast में उजागर की। 🇮🇳
हम इस लेख में विस्तार से समझेंगे कि कैसे कथित लेफ्ट-लिबरल मीडिया घराने, तथाकथित पत्रकार और उनके एक्टिविस्ट-पत्रकार साथी भारत की आम जनता को गुमराह कर रहे हैं। कैसे हर मोदी जी के निर्णय को फासीवाद कहा जाता है, लेकिन असली फासीवाद पर इनकी जुबान सिल जाती है।
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🔍 Section 1: Selective Outrage – जब अंधे हो जाते हैं तथाकथित पत्रकार
🗣️ हरियाणा बनाम पंजाब: Coverage का दोहरा मापदंड
Ajit Anjum, जो हरियाणा में राकेश टिकैत और MSP के मुद्दे पर बार-बार गए, लेकिन पंजाब में जब असल किसान त्रस्त हुए – एक वीडियो तक नहीं बनाया।
वही Ravish Kumar, जिन्होंने Hindenburg पर 141 वीडियो बनाए लेकिन Hindenburg के ऑफिस बंद होने पर एक लाइन भी नहीं बोली।
📌 वास्तविक प्रश्न: क्या इनका नैरेटिव पहले से तय है?
⚙️ Section 2: Shiv Sena – असली कौन? नकली कौन?
🚩 एकनाथ शिंदे vs ठाकरे गुट
Harsh Ji का स्पष्ट मत: “असली शिवसेना वही है जो बाला साहब की शिवसेना थी — जो हिंदुत्व के लिए अडिग थी।”
ठाकरे गुट की चुप्पी कंगना रनौत के मामले में, जब BMC ने उनका घर तोड़ा – क्या यही लोकतंत्र है?
📍 विश्लेषण: लेफ्टिस्ट मीडिया ने कंगना पर BMC की कार्रवाई को जस्टीफाई किया लेकिन कुणाल कामरा के शो पर कार्रवाई होते ही “फ्रीडम ऑफ स्पीच” की दुहाई!
⚔️ Section 3: Farmers’ Protest – Hidden Agendas Exposed
💰 ट्रैडर्स का असली रोल
दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन को वही ट्रैडर्स स्पॉन्सर कर रहे थे जो पंजाब में जाकर विरोध कर रहे थे।
दिल्ली के आम जनता की सांसें रोकी गईं लेकिन कोई PIL, कोई विरोध नहीं।
🚨 सवाल उठता है: क्या ये आंदोलन शुद्ध किसान आंदोलन थे या प्रायोजित राजनीतिक ड्रामे?
🧠 Section 4: Media में गिरगिटों की टोली – रंग वही, चेहरे अलग
“ये गिरगिट नहीं है, ये गिरगिटों का बाप है” – Harsh Ji ने सीधे निशाना साधा उन तथाकथित पत्रकारों पर जो समय के अनुसार रंग बदलने की कोशिश नहीं करते, बल्कि हमेशा से वही नकाब पहन कर बैठे हैं।
ज्यों ही एक मामला सरकार के पक्ष में जाता है – चुप्पी। विरोध में जाता है – तूफान।
📢 विश्लेषण: मीडिया अब खबरें नहीं बनाता, नैरेटिव गढ़ता है।
💥 Section 5: Soros, Hindenburg, और Anti-Bharat एजेंडा
NGO की आड़ में विदेशी फंडिंग, Ecosystem Creation, और “Narrative Warfare” – सब सोची-समझी साजिशें हैं।
Soros की कंपनियां भारत में पैसा भेजती थीं ताकि ये तय किया जा सके कि किसको कितना बोलना है।
📜 ED के बयान अनुसार: “We are not stopping at the source, we will reach the final beneficiary.”
🚨 Section 6: Stand-Up Comedians or Propaganda Machines?
कुणाल कामरा, Sanjay Raut के साथ बैठकर कंगना पर खिलौने वाले बुलडोज़र का मजाक उड़ाता है।
वही अब तमिलनाडु में छुपा बैठा है, क्योंकि अब बारी है असली न्याय की।
📣 विचार: व्यंग्य की आड़ में हिंदू संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा पर हमला करना क्या कॉमेडी है?
📈 Section 7: The Fall of Ravish, Ajit, and the Rise of Bharat Narrative
Ravish के वीडियोज की व्यूअरशिप घट चुकी है, Ajit Anjum कैमरे से गायब हैं।
अब भारत के लोग देख रहे हैं: जयपुर डायलॉग्स, Harsh Kumar, Sanjeev Srivastava, Abhishek Tiwari — क्योंकि इनकी बातों में तथ्य हैं, धृष्टि है, और धार्मिक चेतना है।
📰 Section 8: Mainstream vs New Bharat Media
| Traditional Media | Bharat Media (YouTube, Podcasts) |
|---|---|
| एड और फंडिंग पर निर्भर | जनता की ताकत और सच्चाई पर आधारित |
| प्रायोजित नैरेटिव | स्वतन्त्र विचार |
| डिबेट्स में चिल्लाना | तथ्यात्मक चर्चा |
| झूठ पर पर्दा | सच्चाई का पर्दाफाश |
🕊️ Conclusion: सत्य का उदय और मीडिया क्रांति
आज की तारीख में जनता जाग चुकी है। अब Ravish की चीखें, Ajit की चुप्पी, Soros की फंडिंग, और कामरा की नौटंकी ज्यादा दिन नहीं चलने वाली।
✨ नया भारत वही देखता है जो सत्य हो। और नया मीडिया वही सुनाता है जो राष्ट्रहित में हो।
📣 Harsh Kumar जैसे पत्रकार और संजय दीक्षित जैसे चिंतक आज के अखंड भारत के युगद्रष्टा हैं। उनका सम्मान और समर्थन करना हमारा कर्तव्य है।
📞 Call to Action
🙏🏼 यदि आप भी मीडिया के झूठ से तंग आ चुके हैं और सत्य की राह पर चलना चाहते हैं – तो स्वदेशी मीडिया प्लेटफॉर्म्स को समर्थन दीजिए।
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🚩जय सनातन धर्म, जय भारत, वंदे मातरम्🚩
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