दोस्तों, Guruji Ka Tandav Show में आपका स्वागत है।
पिछले दिनों स्वामी प्रसाद मौर्य ने अपने मंच से खड़े होकर वेद के पुरुष सूक्त के ऊपर कुछ अभद्र टीका-टिप्पणी की थी। कहा — “ब्राह्मण स्वयंभू हैं, और कैसा स्वयंभू? जो अपनी मां के गर्भ से पैदा होने में विश्वास नहीं करते, कहते हैं हम ब्रह्मा के मुख से पैदा हुए हैं।”
मैं उस समय प्रवास पर था। बाहर से ही मैंने एक छोटा सा वीडियो बनाकर पोस्ट किया था, लेकिन उस वीडियो के ऊपर भी वही सड़ी हुई मानसिकता वाले लोगों की गालियां और अभद्र टिप्पणियां आईं।
इसलिए आज, Guruji Ka Tandav Show में, मैं एक विस्तृत वीडियो लेकर आया हूं — जिसमें आपको प्रमाणों के साथ बताऊंगा…
ब्रह्मा नहीं बुद्ध के मुँह से पैदा हुए थे लोग | SANATAN Vs BUDDHISM | BRAHMA Vs BUDDHA
किस प्रकार से महात्मा बुद्ध ने भी एक लड़की ही नहीं बल्कि कई पुरुषों और स्त्रियों को मुख से जन्म दिया था, और इसके प्रमाण उनकी खुद की पुस्तकों में लिखे हुए हैं।
उनके शिष्य और शिष्याएं स्वयं कहते हैं — “हम बुद्ध के मुख से जन्मे हैं।”
इन सारे ग्रंथों की प्रमाणिकता, उनका काल, और उनका ऐतिहासिक संदर्भ मैं आपको बताऊंगा। और फिर लास्ट में आपसे ये प्रश्न करूंगा —
अगर महात्मा बुद्ध के मुंह से उनके शिष्यों का जन्म हो सकता है, तो क्या महात्मा बुद्ध के मुंह में भी महावारी आती थी?
क्या उनका मुख इतना बड़ा था कि उसमें से कोई बच्चा जन्म ले सकता था?
क्योंकि इसी प्रकार के सवाल ब्रह्मा के विषय में भी पूछे जाते हैं।
अब आते हैं इसी मुद्दे पर — पुरुष सूक्त में जो वर्ण व्यवस्था बताई गई है, वही चार वर्ण आज भी चलते हैं और संवैधानिक प्रक्रिया के हिसाब से चलते हैं।
वहां पर बताए गए थे चार वर्ण।
आज भी हमारे यहां कैटेगरीज होती हैं — A कैटेगरी, B कैटेगरी, C कैटेगरी और D कैटेगरी।
वहां ब्राह्मण में वो आता था जो सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा होता था।
यहां A कैटेगरी में वो आते हैं जो IAS, IPS बनते हैं — सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे।
उसके बाद B कैटेगरी — जिसे क्षत्रिय कहा गया।
C कैटेगरी — शिक्षा में उससे कम लेकिन अनुभव में ज्यादा — जिन्हें वैश्य कहा गया।
और D कैटेगरी — सबसे कम पढ़े-लिखे, सेवा का कार्य करने वाले — जिन्हें सर्विस सेक्टर या शूद्र कहा गया।
बाद में बहुत लोगों ने इसको जन्मना जाति बना दिया और अंबेडकर ने भी अपने संविधान में इसको ज्यों का त्यों बरकरार रखा।
अगर अंबेडकर को इससे बहुत समस्या थी, तो वो इसे बदल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रखा।
दूसरी बड़ी बात — जो कांग्रेसी इस पर झूम रहे हैं, उनको मोहनदास करमचंद गांधी का वो बयान पढ़ना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा था —
हम जाति व्यवस्था से ऊपर नहीं जा सकते, हम इसी में विश्वास करते हैं।
वेद हो, दर्शन हो, उपनिषद हो या गीता — सभी कहते हैं:
चातुर वर्ण मया सृष्टं गुण कर्म विभागशः
अर्थात — गुण और कर्म के हिसाब से ही विभाग, जन्म के आधार पर नहीं।
जन्मना जायते शूद्रः, संस्काराद् द्विज उच्यते
मतलब — जन्म से सभी शूद्र होते हैं, संस्कार और शिक्षा से ही द्विज बनते हैं।
जिनमें संस्कार नहीं, वे शूद्र ही रह जाते हैं।
लेकिन इस वैज्ञानिक और सामाजिक ताने-बाने को आक्रमणकारियों ने तोड़ दिया, और जन्मना जाति को स्थापित कर दिया।
वेदों और उपनिषदों को गाली देने वालों को पलटवार मिलेगा — क्योंकि फिर आपसे भी पूछा जाएगा —
बौद्ध मत में इतने सेक्ट्स क्यों हैं?
ऊंच-नीच और भेदभाव क्यों है?
एक मठ से दूसरे मठ में जाने पर मारपीट क्यों होती है?
बुद्ध मत में “भिक्षु” शब्द आता है — जिसका अर्थ है “भीख मांगना”।
और ये सिर्फ नाम नहीं, ये लोग सचमुच भीख मांगते हैं — डोला उठाकर गांव-गांव जाते हैं।
एक बौद्ध मठ के अंदर हजारों अश्लील वीडियो शूट हुए — मठ को वैश्यालय बना दिया गया।
पुरुष सूक्त पर बात करते हुए मैंने कहा था — विद्वान का कार्य मुख से, क्षत्रिय का कार्य बाहुबल से, वैश्य का कार्य व्यापार से, और पैरों का कार्य पूरे ढांचे का भार संभालना है।
वर्ण व्यवस्था योग्यता और शिक्षा के आधार पर थी — ये प्रतीकात्मक थी, कोई वास्तव में हाथ या पैर से पैदा नहीं हुआ।
स्वामी प्रसाद मौर्य कहते हैं — मुख से पैदा हुए हैं तो आज दिखाओ।
तो मैं पूछता हूं — पैरों से पैदा होने वालों का क्या?
और अगर आपत्ति है तो पहले प्रमाण देखो —
बौद्ध ग्रंथों में लिखा है — शूद्रों का कोई स्थान नहीं, मठ में केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय बन सकते हैं।
लिखा है — महामाया हाथी से गर्भवती हुईं, और गुदा मार्ग से बुद्ध का जन्म हुआ।
अब बताओ — पिछले मार्ग से हाथी का प्रवेश और उसी मार्ग से बुद्ध का जन्म — ये कहां से आया?
अगर हम पूछ लें — आज ऐसा कौन जन्म लेता है? — तो शायद नीले कबूतर कहें — “हम भी उसी मार्ग से जन्मे हैं।”
थेर गाथा पढ़ो — सुंदरी थेरी कहती है — “मैं आपके मुख से उत्पन्न पुत्री हूं।”
तो सवाल — इतनी बड़ी संतान मुख से कैसे निकली?
और वंगीसा थेरा भी यही कहता है — “मैं आपके मुख से जन्मा हुआ पुत्र हूं।”
अगर लिटरल मीनिंग लोगे, तो ये भी उतना ही हास्यास्पद होगा जितना ब्रह्मा के मुख से जन्म का।
असल में ये प्रतीकात्मक है — मुख = ज्ञान का स्रोत।
लेकिन नीले कबूतरों को ये समझ नहीं आएगी।
और अगर ये वीडियो उनके पास पहुंचा, और उन्हें पता लगा कि उनके ग्रंथों में इससे भी ज्यादा “बोगस” बातें हैं, तो शायद बाकी चीजें भी समझ आ जाएं।
लिटरल मीनिंग लेते रहो — हर ग्रंथ में इतनी गंदगी निकलेगी कि संभालना मुश्किल हो जाएगा।
और वो मौलाना जो नीले कबूतरों के दिमाग में ये गंदगी भरते हैं, उनकी अपनी किताबें कितनी गंदी हैं, ये बताने की ज़रूरत नहीं — पिछले 10 साल से मैं ये सब यहां अपलोड कर रहा हूं।
इस वीडियो में बस इतना ही।
अगर आपको ये वीडियो जानकारीपूर्ण लगे, तो इसे शेयर कीजिए, खासकर उन लोगों तक जिन्हें सनातन धर्म का नाम सुनते ही मेंटल पैरालिसिस हो जाता है।
मेरे साथ बोलिए —
सत्य सनातन वैदिक धर्म की जय!
जय हिंद, वंदे मातरम।










